तेजी से बढ़ती पेट्रोल-डीजल की कीमतों के बीच पंपों पर ईंधन चोरी का खेल चरम पर पहुंच गया है। कर्मचारी छोटे-छोटे धोखों से ग्राहकों को बेवकूफ बना रहे हैं। यह समस्या उत्तर भारत में खासकर आम हो चुकी है। दैनिक लाखों ग्राहक अनजाने में शिकार बन रहे हैं। सतर्कता ही एकमात्र हथियार है।

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चिप ट्रिक से मीटर पर धोखा
डिस्पेंसर मशीनों में गुप्त चिप या रिमोट उपकरण फिट कर मीटर की रीडिंग बदल दी जाती है। ग्राहक 500 रुपये का तेल भरवाता है तो मीटर पूरा दिखाता है। लेकिन टैंक में सिर्फ 450 रुपये जितना ही जाता है। यह चिप मशीन को निर्देश देती है कि कम मात्रा भरे। कई बार कंट्रोल बॉक्स या स्टोरेज टैंक से भी छेड़छाड़ होती है। कर्मचारी रिमोट से संचालित कर चोरी को अंजाम देते हैं। इससे पंप मालिकों को भी भारी नुकसान होता है।
शॉर्ट डिलीवरी का जाल
यह तरीका सबसे सरल लेकिन घातक है। मीटर को शून्य से शुरू करवाया जाता है। नोजल टैंक में डालते ही वाल्व बंद कर प्रवाह रोक दिया जाता है। 10-20 सेकंड की देरी से 600 रुपये के पेट्रोल में 50 से 100 रुपये कम हो जाते हैं। ग्राहक को हवा या कम धार का भ्रम होता है। कभी-कभी मीटर सीधे 10-20 लीटर पर कूद जाता है। पाइप में बचा पुराना तेल भी न निकालकर नया ग्राहक ठगा जाता है।
बचाव के व्यावहारिक उपाय
मीटर स्वयं रीसेट करवाएं और शून्य की पुष्टि करें। नोजल डालने से पहले और कटने के बाद थोड़ा रुकें। भराई के दौरान मीटर पर नजर टिकाए रखें। धार में हवा न दिखे इसका ध्यान रखें। वाहन की औसत माइलेज नोट करें। यदि असामान्य रूप से कम हो तो सतर्क हों। विभिन्न पंपों का उपयोग करें। वजन यंत्र या मोबाइल ऐप से ईंधन गुणवत्ता जांचें। रसीद हर बार लें।
शिकायत का सही रास्ता
संदेह हो तो पंप का विवरण नोट करें। तेल कंपनियों की हेल्पलाइन पर कॉल करें। वजन-माप विभाग या स्थानीय प्रशासन को सूचित करें। सीसीटीवी रिकॉर्डिंग की मांग करें। सामूहिक शिकायतें अधिक प्रभावी साबित होती हैं। कई बार लाइसेंस रद्दीकरण तक बात पहुंच जाती है। उपभोक्ता संगठन कानूनी सहायता देते हैं।
ईंधन चोरी आर्थिक अपराध है। सरकार को डिजिटल निगरानी मजबूत करनी चाहिए। ग्राहक जागरूक हों तो यह सिलसिला थम सकता है। सावधानी से जेब बचाएं।
















