
अगर आप भी उन करोड़ों भारतीयों में से एक हैं जो अपनी मेहनत की कमाई को सुरक्षित रखने के लिए आंख मूंदकर सेविंग्स अकाउंट (Savings Account) पर भरोसा करते हैं, तो यह खबर आपके होश उड़ा सकती है, जिसे आप ‘बचत’ समझ रहे हैं, वित्तीय जानकारों की नजर में वह ‘साइलेंट लॉस’ यानी धीमी मौत मरता हुआ निवेश हो सकता है।
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महंगाई की ‘दीमक’ खा रही है आपका पैसा
बैंकिंग सेक्टर के कड़वे सच की शुरुआत ब्याज दर से होती है। अधिकतर बड़े बैंक सेविंग्स अकाउंट पर सालाना 2.7% से 3% का ब्याज दे रहे हैं, जबकि देश में खुदरा महंगाई दर (Inflation) अक्सर 5% से 6% के ऊपर रहती है। इसका सीधा मतलब है कि आपके पैसे की वैल्यू बढ़ने के बजाय हर साल 2-3% घट रही है। सरल शब्दों में, आज जो सामान ₹100 का है, अगले साल वह ₹106 का होगा, लेकिन आपके बैंक में रखे ₹100 महज ₹103 ही बनेंगे।
‘हिडन चार्जेस’ की सर्जिकल स्ट्राइक
बैंक केवल ब्याज ही कम नहीं देते, बल्कि कई रास्तों से आपके जमा पैसे को काटते भी हैं।
- न्यूनतम बैलेंस की मार: औसत मासिक बैलेंस (AMB) मेंटेन न करने पर भारी पेनल्टी।
- सर्विस फीस: डेबिट कार्ड का सालाना मेंटेनेंस, एसएमएस अलर्ट चार्ज और चेकबुक के नाम पर होने वाली कटौती।
- लिमिट का खेल: एक तय सीमा से अधिक एटीएम ट्रांजैक्शन या ब्रांच से नकद निकासी पर लगने वाला अतिरिक्त शुल्क।
टैक्स का दोहरा झटका
सेविंग्स अकाउंट से होने वाली ब्याज की कमाई पूरी तरह ‘फ्री’ नहीं है, आयकर की धारा 80TTA के तहत केवल ₹10,000 तक के ब्याज पर छूट मिलती है, यदि आपका ब्याज इससे अधिक है, तो वह आपकी कुल आय में जुड़ जाता है और आपके टैक्स स्लैब (20% या 30%) के हिसाब से सरकार के खाते में चला जाता है, यानी रिटर्न कम और उस पर टैक्स का बोझ ज्यादा।
₹5 लाख की सुरक्षा का ‘दायरा’
आम आदमी को लगता है कि बैंक में रखा उसका हर रुपया सुरक्षित है, लेकिन हकीकत यह है कि यदि कोई बैंक दिवालिया होता है, तो डिपॉजिट इंश्योरेंस एंड क्रेडिट गारंटी कॉरपोरेशन (DICGC) के नियमों के अनुसार केवल ₹5 लाख तक की राशि (मूलधन + ब्याज) ही सुरक्षित होती है। इसके ऊपर की जमा राशि मिलने की कोई कानूनी गारंटी नहीं होती।
आपके पैसे से बैंकों की ‘चांदी’
आप अपना पैसा 3% ब्याज पर बैंक को देते हैं और वही बैंक उसी पैसे को पर्सनल लोन या क्रेडिट कार्ड के रूप में दूसरों को 12% से 18% ब्याज पर उधार देता है, आपके और बैंक के बीच का यह भारी ‘मार्जिन’ ही बैंकों का मुनाफा है, जिसमें जमाकर्ता (यानी आप) सबसे कम लाभ पाने वाला पक्ष होता है।
एक्सपर्ट की राय: क्या करें?
फाइनेंशियल एक्सपर्ट्स का मानना है कि सेविंग्स अकाउंट में केवल ‘इमरजेंसी फंड’ (6 महीने का खर्च) ही रखना चाहिए बाकी पैसों के लिए ‘स्वेप-इन एफडी’ (Sweep-in FD) की सुविधा लें, जहाँ आपको एफडी जैसा रिटर्न और सेविंग्स जैसी लिक्विडिटी मिलती है, इसके अलावा लिक्विड फंड्स या शॉर्ट टर्म डेट फंड्स भी एक बेहतर विकल्प हो सकते हैं।
















