Join Youtube

क्या बेटियों को पिता की संपत्ति में नहीं मिलेगा हक? सुप्रीम कोर्ट के ताजा फैसले ने दूर किया सारा कंफ्यूजन; जानें क्या है नियम

बेटियों को पिता की संपत्ति में अब बेटे के बराबर हक मिलता है, चाहे वे शादीशुदा हों या न हों। कानूनी जानकारी और जागरूकता से ही उनका यह हक सुरक्षित रह सकता है।

Published On:

परिवारों में अक्सर यह सवाल उठता है कि क्या बेटियां पिता की संपत्ति से वंचित रह जाएंगी। सुप्रीम कोर्ट के स्पष्ट फैसलों ने इस भ्रम को हमेशा के लिए खत्म कर दिया है। हिंदू कानून के तहत बेटियां पैतृक संपत्ति में बेटों के बराबर हकदार हैं। यह अधिकार जन्म से ही मिलता है और शादी के बाद भी बना रहता है।

क्या बेटियों को पिता की संपत्ति में नहीं मिलेगा हक? सुप्रीम कोर्ट के ताजा फैसले ने दूर किया सारा कंफ्यूजन; जानें क्या है नियम

पैतृक संपत्ति क्या है?

पैतृक संपत्ति वह होती है जो चार पीढियों से परिवार में चली आ रही हो। हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम के संशोधन ने बेटियों को इसमें समान हिस्सेदार बना दिया। कोर्ट ने कहा कि बेटी का जन्म ही उसके हिस्से का प्रमाण है। चाहे बेटी 2005 से पहले पैदा हुई हो या बाद में, उसका अधिकार अटल है। स्व-अर्जित संपत्ति पर पिता वसीयत बना सकता है, लेकिन पैतृक हिस्से पर सभी संतानों का बराबर दावा रहता है।

ऐतिहासिक फैसले का असर

2020 का विनीता शर्मा मामला मील का पत्थर साबित हुआ। सुप्रीम कोर्ट ने घोषणा की कि बेटियां हिंदू अविभाजित परिवार में सह-मालिक होती हैं। इसके बाद कई फैसलों ने इस नियम को मजबूत किया। अब विवाहित बेटियां भी पैतृक संपत्ति पर चचेरे भाइयों से अधिक हक रखती हैं। पिता की मृत्यु के बाद बेटियां आधे या इससे ज्यादा हिस्से की दावेदार बन सकती हैं, खासकर अगर भाई कम हों।

यह भी पढ़ें- CSIR NET June 2026: जून सेशन के लिए नोटिफिकेशन जल्द! संभावित एग्जाम डेट और पात्रता मानदंड यहाँ देखें।

शादी का कोई असर नहीं

लोग सोचते हैं कि शादी के बाद बेटियों का हक खत्म हो जाता है। कोर्ट ने साफ कहा कि ऐसा नहीं है। शादीशुदा बेटी भी पिता की पैतृक संपत्ति में बराबरी का दावा कर सकती है। यह महिलाओं के सशक्तिकरण का बड़ा कदम है। लाखों परिवारों को इससे न्याय मिला है।

अपवाद और सावधानियां

कुछ स्थितियां अलग हैं। अगर पिता ने संशोधन से पहले बंटवारा कर दिया या वसीयत लिख दी, तो दावा जटिल हो सकता है। यह नियम हिंदू, सिख, जैन और बौद्ध परिवारों पर लागू होता है। अन्य धर्मों के कानून अलग हैं। सोशल मीडिया की अफवाहों से बचें। हर मामले में तथ्य जांचें।

कानूनी कदम उठाएं

यदि आपके परिवार में ऐसी स्थिति है, तो वकील से सलाह लें। दस्तावेज तैयार रखें और समय रहते दावा करें। सुप्रीम कोर्ट के ये फैसले लैंगिक समानता सुनिश्चित करते हैं। बेटियां अब संपत्ति के साथ सम्मान भी पा रही हैं। परिवारों को जागरूक होना चाहिए ताकि भविष्य में विवाद न हों। यह बदलाव समाज की प्रगति का संकेत है।

Author
info@sargujauniversity.in

Leave a Comment

संबंधित समाचार